Saturday, February 27, 2010



बचपन का ज़माना होता था,
खुशिओं का खज़ाना होता था.

चाहत चाँद को पाने की,
दिल तितली का दीवाना होता था.

रोने की वजह न होती थी,
हसने का बहाना होता था.

खबर न थी कुछ सुबहों की ,
ना शामों का ठिकाना होता था.

दादी की कहानी होती थी,
परियों का फ़साना होता था.

पेड़ों की शाखें छूते थे ,
मिटटी का खिलौना होता था.

गम की जुबान ना होती थी,
ना ज़ख्मों का पैमाना होता था.

बारिश में कागज़ की कश्ती,
हर मौसम सुहाना होता था.

वो खेल वो साथी होते थे,
हर रिश्ता निभाना होता था.

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